Friday, December 19, 2008

किताबी कीड़ा : एक संक्षिप्त परिचय

मुझे किताबें पढने का शौक बचपन से ही है. माँ कहीं जाती थी तो मेरे लिए किताबें, पत्रिकाएं रखना नहीं भूलती थीं. मेरे समवयस्क और दूसरे परिचित किताबी कीड़ा कहते थे. इस "किताबी कीड़े" ने जो किताबें पढी हैं, और जिन्हें पढूंगा उन पर समीक्षा, तबसरा, टिप्पणियों के साथ यह ब्लॉग मेरी माँ श्रीमती शान्ति वर्मा को समर्पित है. माँ सन १९९१ में नहीं रहीं. उनकी स्मृतियों को ये शेर समर्पित है :लाख पोशीदा रहे तू मेरी नज़रों से, मगर-मेरा होना, तेरे होने का पता देता है. (यदि कोई सज्जन इस शेर के रचनाकार का नाम बता सकें और ये मुक़म्मल ग़ज़ल मुझे मुहय्या करा सकें तो मैं उनका तहे-दिल से मशकूर रहूँगा- आनंदकृष्ण)

2 comments:

  1. apke blog ko padhne se gyaat hota hai ki aap uchch koti ke vidwan tatha sameeksh hain apka saanidhya hamari vangmayee yatra ka pathey siddh hoga.

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  2. aap ka sukha achcha laga aur ye jaan kar bhi achcha laga ki aap ek samaj sewak ya ngo se wasta bhi rakhte hai ye mere liye khushee kee baat hai

    par varta jaaree rahegee

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